jharkhand high court
307 की दोषसिद्धि बदली, आर्म्स एक्ट में बरी.
झारखंड हाईकोर्ट ने पुराने गोलीकांड मामले में लक्ष्मीकांत दास को राहत दी है। अदालत ने उसकी दोषसिद्धि को धारा 307 से बदलकर धारा 324/34 आईपीसी कर दिया। आर्म्स एक्ट की धारा 27 में उसे बरी कर दिया गया। कोर्ट ने इस आरोप में उसे संदेह का लाभ दिया। धारा 324 के तहत पहले जेल में बिताई अवधि को ही सजा माना गया। लक्ष्मीकांत पांच माह 15 दिन न्यायिक हिरासत में रह चुका है। वह वर्तमान में जमानत पर था। अदालत ने उसे जमानत बांड से मुक्त कर दिया।
यह मामला वर्ष 1990 की एक फायरिंग की घटना से जुड़ा है। घटना 13 जून को सरायकेला थाना क्षेत्र के घाघी गांव में हुई थी। अभियोजन के अनुसार, घासीराम महतो और कंद्रू महतो बाड़ी में बाउंड्री कर रहे थे। तभी लक्ष्मीकांत दास, अमूल्य कुमार दास और ज्ञानी दास वहां पहुंचे। आरोप है कि उन्होंने बाउंड्री का काम रोकने की कोशिश की। इसके बाद विवाद बढ़ गया। अभियोजन ने अमूल्य दास पर तीर चलाने का आरोप लगाया। तीर लक्ष्य पर नहीं लगा था।
इसके बाद लक्ष्मीकांत दास पर बंदूक चलाने का आरोप लगाया गया। फायरिंग के छर्रों से तीन लोग घायल हुए थे। घायलों में घासीराम, कंद्रू और रंजीत महतो शामिल थे। इस घटना पर सरायकेला थाने में कांड संख्या 41/1990 दर्ज हुई थी। ट्रायल कोर्ट ने 16 अप्रैल 2003 को लक्ष्मीकांत को धारा 307 में सात वर्ष की सजा दी थी। उसे आर्म्स एक्ट की धारा 27 में तीन वर्ष की सजा भी मिली थी। दोनों सजाएं साथ चलनी थीं। अमूल्य और ज्ञानी को भी धारा 307/34 में सात वर्ष की सजा दी गई थी। बाद में दोनों की मृत्यु हो गई और उनके खिलाफ अपील समाप्त हो गई।
हाईकोर्ट ने अपील में अभियोजन के साक्ष्यों की जांच की। अदालत ने पाया कि 11 गवाहों की गवाही के बावजूद जांच अधिकारी पेश नहीं हुआ था। घायल गवाहों की चोटों से संबंधित इंजरी रिपोर्ट भी रिकॉर्ड पर नहीं थी। डॉक्टर चोटों की प्रकृति के बारे में स्पष्ट राय नहीं दे सके। घटनास्थल से छर्रे या खाली कारतूस बरामद होने का भी पर्याप्त साक्ष्य नहीं था। अमूल्य दास के घर से बंदूक, लाइसेंस और एक खाली कारतूस जब्त हुआ था। हालांकि बैलिस्टिक रिपोर्ट के अभाव में उस हथियार को घटना से जोड़ना साबित नहीं हुआ। अदालत ने बंदूक का लाइसेंस अमूल्य दास के नाम होने को भी महत्वपूर्ण माना। उसके धारा 313 के बयान में आत्मरक्षा में हवा में गोली चलाने की बात कही गई थी। हाईकोर्ट ने माना कि फायरिंग की घटना से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन यह निश्चित रूप से साबित नहीं हुआ कि गोली लक्ष्मीकांत ने ही चलाई थी। अदालत ने कहा कि धारा 307 के लिए जरूरी मंशा या जानकारी भी पर्याप्त रूप से स्थापित नहीं हुई। हालांकि खतरनाक हथियार से चोट पहुंचाने के आधार पर धारा 324/34 के तहत दोष सिद्ध माना गया। वर्ष 1990 की घटना और लंबे समय से चले मुकदमे को देखते हुए अदालत ने आगे की सजा जरूरी नहीं मानी। इसी आधार पर पांच माह 15 दिन की जेल अवधि को पर्याप्त मानते हुए अपील को आंशिक रूप से स्वीकार किया गया।