jharkhand high court
घायल प्रत्यक्षदर्शी की गवाही और मेडिकल साक्ष्य निर्णायक बने.
रांची में झारखंड हाईकोर्ट ने एक पुराने आपराधिक मामले में महत्वपूर्ण फैसला दिया है। अदालत ने हत्या के प्रयास और लूट के मामले में दोषियों की अपील खारिज कर दी है। साथ ही निचली अदालत की सजा को बरकरार रखा है। कोर्ट ने कहा कि घायल प्रत्यक्षदर्शी की गवाही विश्वसनीय है। उसके बयान में कोई बड़ा विरोधाभास नहीं मिला। अदालत ने कहा कि कानून में घायल गवाह की गवाही को खास महत्व दिया जाता है। इस गवाही को बिना ठोस कारण के खारिज नहीं किया जा सकता। मेडिकल साक्ष्य भी गवाह के बयान का समर्थन करते हैं। इसलिए अभियोजन की कहानी मजबूत साबित होती है। अदालत ने सजा को उचित बताया।
खंडपीठ ने आदेश में कहा कि दोनों आरोपी फिलहाल जमानत पर हैं। ऐसे में उनकी जमानत रद्द की जाती है। अदालत ने निर्देश दिया कि वे दो महीने के भीतर ट्रायल कोर्ट में आत्मसमर्पण करें। इसके बाद उन्हें शेष सजा काटनी होगी। अगर वे तय समय में आत्मसमर्पण नहीं करते हैं तो गिरफ्तारी की कार्रवाई होगी। यह फैसला न्यायमूर्ति रंगन मुखोपाध्याय और न्यायमूर्ति प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने सुनाया। अदालत हरिहर ठाकुर और अर्जुन ठाकुर की क्रिमिनल अपील पर सुनवाई कर रही थी। दोनों ने निचली अदालत के फैसले को चुनौती दी थी। सुनवाई के बाद अदालत ने अपील खारिज कर दी।
मामले की घटना वर्ष 2000 की बताई जाती है। उस समय उमाकांत साह अपनी मोटरसाइकिल से घर लौट रहे थे। त्रिकोणी नदी के पास कुछ लोगों ने उन्हें रोक लिया। आरोप है कि हरिहर ठाकुर के कहने पर अर्जुन ठाकुर ने गोली चलाई। गोली उनकी पीठ में लगी और पेट से बाहर निकल गई। इसके बाद चाकू से भी हमला किया गया। आरोपी उनकी मोटरसाइकिल लेकर फरार हो गए। घायल को पहले हिरणपुर अस्पताल ले जाया गया। बाद में इलाज के लिए कोलकाता भेजा गया।