jharkhand high court
गेट बंद होने से कर्मचारियों की आवाजाही पर पड़ा था असर.
झारखंड हाईकोर्ट ने बोकारो स्टील प्लांट के सभी प्रवेश द्वार बंद किए जाने के मामले में रविवार को सुनवाई की। यह सुनवाई पूजा अवकाश के दौरान सेल की याचिका पर हुई। कंपनी ने अदालत से गतिरोध दूर कराने के लिए तत्काल हस्तक्षेप की मांग की थी। मुख्य न्यायाधीश के निर्देश पर मामले की सुनवाई के लिए विशेष पीठ गठित की गई। न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद की अदालत में दोपहर 2:15 बजे कार्यवाही हुई। सेल की ओर से अधिवक्ता इंद्रजीत सिन्हा ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए अपनी दलीलें रखीं। कंपनी की ओर से अधिवक्ता बिभाष सिन्हा और ऋषव राज भी उपस्थित रहे। राज्य सरकार का प्रतिनिधित्व अपर महाधिवक्ता जय प्रकाश ने किया। बोकारो के उपायुक्त अजय नाथ झा और पुलिस अधीक्षक नाथू सिंह मीणा ऑनलाइन सुनवाई में शामिल हुए। उपायुक्त ने बताया कि जिला प्रशासन ने आंदोलनकारियों को हटाने के लिए कार्रवाई की है। उनके अनुसार, प्लांट के सभी 11 गेट खुलवा दिए गए हैं। सेल के अधिवक्ता ने कंपनी से जानकारी लेकर बाकी दस गेट खुलने की भी पुष्टि की। अदालत ने इस जानकारी को रिकॉर्ड पर लिया। उपायुक्त ने भरोसा दिया कि कर्मचारियों की आवाजाही और प्लांट के संचालन में आगे कोई बाधा नहीं आने दी जाएगी। अदालत ने उनके आश्वासन के बाद गृह सचिव को फिलहाल तलब नहीं किया। दोनों जिला अधिकारियों को अगली सुनवाई से पहले शपथपत्र दाखिल करना होगा। मामले की अगली तारीख 28 अक्टूबर 2026 तय की गई है।
सेल ने अदालत को बताया कि 16 अक्टूबर की सुबह से प्लांट के गेटों पर अवरोध उत्पन्न हो गया था। कंपनी के मुताबिक, इसके कारण लगभग 3500 कर्मचारी और श्रमिक परिसर में फंस गए थे। इससे उनकी ड्यूटी और शिफ्ट बदलने की व्यवस्था प्रभावित हुई। याचिका में दावा किया गया कि कर्मचारियों को भोजन, पानी और दवाएं उपलब्ध कराने में भी मुश्किल आई। कंपनी ने बताया कि स्टील प्लांट में कई औद्योगिक प्रक्रियाएं लगातार संचालित होती हैं। इनमें ब्लास्ट फर्नेस और पिघले हुए लोहे का काम शामिल है। उच्च दबाव वाली पाइपलाइन और संवेदनशील गैस प्रणालियों के कारण सुरक्षा का विशेष ध्यान रखना पड़ता है। ऐसे में आवश्यक कर्मचारियों और रखरखाव दल की आवाजाही रुकने से दुर्घटना की आशंका बढ़ सकती है। सेल ने यह भी कहा कि अचानक संयंत्र बंद होने पर करीब 12 हजार टन पिघला स्टील ब्लास्ट फर्नेस में जम सकता है। इससे संयंत्र को बड़ा आर्थिक नुकसान हो सकता है और पर्यावरण तथा मानव जीवन पर खतरा पैदा हो सकता है। कंपनी ने गेटों पर अवरोध के लिए बोकारो की विधायक श्वेता सिंह और विस्थापित अप्रेंटिस संघ के आंदोलनकारियों को जिम्मेदार ठहराया। यह आरोप सेल की ओर से अदालत में रखे गए पक्ष का हिस्सा था। अदालत ने उपायुक्त से पूछा कि क्या प्रशासन को स्थिति संभालने में किसी तरह की कठिनाई हो रही है। उपायुक्त ने कहा कि वह स्थिति को नियंत्रित कर सकते हैं। उन्होंने किसी वरिष्ठ अधिकारी को बुलाने की जरूरत से इनकार किया। अदालत ने फिलहाल विधायक और संघ को नोटिस जारी नहीं किया। उसने जिला प्रशासन से अपने आश्वासन को शपथपत्र के माध्यम से प्रमाणित करने को कहा।
सुनवाई के दौरान सेल ने विस्थापितों की नियुक्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट के पुराने आदेशों का हवाला भी दिया। पांच मार्च 2008 को शीर्ष अदालत ने भूमि अधिग्रहण से प्रभावित 970 लोगों के नामों पर नियुक्ति के लिए विचार करने और अन्य शर्तें समान होने पर प्राथमिकता देने की बात कही थी। उस आदेश में यह भी साफ किया गया था कि इससे नियुक्ति का स्वतः अधिकार नहीं मिलता। 27 सितंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित आवेदन खारिज कर दिया था। शीर्ष अदालत ने उस समय कहा था कि मामले को समाप्त किया जाना चाहिए। उसने यह भी कहा था कि पहले से लंबित नहीं रही सिविल अपील में ऐसे आवेदन पर विचार नहीं किया जा सकता। सेल ने इन फैसलों का उल्लेख कर वर्तमान गतिरोध की पृष्ठभूमि बताई। इससे पहले कंपनी ने हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को पत्र भेजकर तत्काल सुनवाई की मांग की थी। कंपनी का कहना था कि गेट बंद रहने से कर्मचारियों के साथ कच्चे माल और जरूरी सामान की आवाजाही भी प्रभावित हो रही थी। अदालत ने जिला प्रशासन की ओर से गेट खुलवाने और आगे बाधा नहीं आने देने के आश्वासन को दर्ज किया। अगली सुनवाई में उपायुक्त और पुलिस अधीक्षक के शपथपत्रों के आधार पर स्थिति की समीक्षा की जाएगी।