jharkhand high court
संदेह का लाभ देकर लालू राम को किया बरी.
रांची: गुमला के एक पुराने हत्या मामले में झारखंड हाईकोर्ट ने आरोपी लालू राम को राहत दी है। करीब नौ साल से चल रहे इस मामले में लालू राम उम्रकैद की सजा काट रहा था। हाईकोर्ट ने अब उसकी सजा को रद्द करते हुए उसे बरी कर दिया है। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष हत्या का आरोप संदेह से परे साबित नहीं कर पाया। कोर्ट ने इसी आधार पर आरोपी को संदेह का लाभ दिया। मामला वर्ष 2014 में गुमला के पालकोट थाना क्षेत्र में हुई हत्या से जुड़ा है। लालू राम ने अपनी दोषसिद्धि और सजा के खिलाफ क्रिमिनल अपील दाखिल की थी। हाईकोर्ट ने अपील पर सुनवाई के बाद निचली अदालत के फैसले की समीक्षा की। अदालत ने मामले में पेश किए गए साक्ष्यों और परिस्थितियों पर विचार किया। इसके बाद कोर्ट ने अप्रैल 2017 के सजा के फैसले को रद्द कर दिया। लालू राम के जेल में होने को देखते हुए अदालत ने उसकी रिहाई को लेकर भी आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि किसी अन्य मामले में वांछित नहीं होने पर उसे तत्काल जेल से रिहा किया जाए।
अभियोजन के मुताबिक, 23 अगस्त 2014 को पालकोट थाना क्षेत्र के पीरहा चट्टान गांव में हत्या हुई थी। इस घटना में रामप्रीत राम की जान चली गई थी। आरोप था कि उसकी गर्दन पर कुल्हाड़ी से वार किया गया था। बताया गया कि घटना के वक्त रामप्रीत राम घर में सो रहा था। अभियोजन ने इस हत्या के पीछे जमीन विवाद को कारण बताया था। आरोप लगाया गया कि जमीन विवाद को लेकर उसके चचेरे भाई लालू राम ने हमला किया था। घटना के बाद पुलिस ने मामले की जांच शुरू की थी। 24 अगस्त 2014 को पालकोट थाना में इस संबंध में प्राथमिकी दर्ज की गई। पुलिस रिकॉर्ड में मामले का कांड संख्या 52/2014 बताया गया। जांच पूरी करने के बाद पुलिस ने लालू राम के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया था। उस पर IPC की धारा 302 के तहत हत्या का आरोप लगाया गया था। इसके बाद मामला न्यायिक प्रक्रिया के तहत निचली अदालत में पहुंचा। अप्रैल 2017 में निचली अदालत ने लालू राम को हत्या का दोषी ठहराया।
निचली अदालत के फैसले के बाद लालू राम को उम्रकैद की सजा भुगतनी पड़ी। उसने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। क्रिमिनल अपील की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने अभियोजन के पूरे मामले की जांच की। कोर्ट ने माना कि उपलब्ध साक्ष्य आरोपी को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। अदालत के मुताबिक, हत्या का आरोप संदेह से परे साबित होना जरूरी है। लेकिन अभियोजन पक्ष इस कानूनी कसौटी को पूरा करने में सफल नहीं रहा। इसके बाद हाईकोर्ट ने लालू राम को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। निचली अदालत का अप्रैल 2017 का फैसला भी रद्द कर दिया गया। अदालत ने जेल में बंद आरोपी की रिहाई का निर्देश दिया। हालांकि, रिहाई से पहले यह सुनिश्चित किया जाएगा कि वह किसी अन्य आपराधिक मामले में वांछित नहीं है। हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद लालू राम को करीब नौ साल पुराने मामले में बड़ी कानूनी राहत मिली है। मामले में अब उसकी उम्रकैद की सजा प्रभावी नहीं रहेगी।